अगर कोई देश सितारों को सामान्य समझना चाहता है तो इसमें क्या हर्ज है? मुद्दा यह है कि हमने जिस वीआईपी संस्कृति को विकसित किया है, वह परोक्ष रूप से आम आदमी का अपमान है।
अमेरिका के एक एयरपोर्ट पर शाहरुख खान को मुस्लिम होने के कारण दो घंटे तक गहन जांच-पड़ताल से गुजरना पड़ा। इस प्रकरण से दो बातें जुड़ी हैं। एक तो यह कि अमेरिका अपनी आंतरिक सुरक्षा को लेकर इतना भयभीत है कि रस्सी को भी सांप समझकर डर जाता है, परंतु हर देश अपनी सुरक्षा को लेकर अपने तौर-तरीके चुनने के लिए आजाद है।
छद्म बौद्धिकता वाले क्षेत्रों में अमेरिका उनका प्रिय शिकार है। दूसरी बात यह है कि कोई भी सितारा सामान्य व्यवहार को अपना अपमान क्यों समझने लगता है? भारत में उन्हें सिर पर बैठाया जाता है, तो यह जरूरी नहीं कि अन्य देश भी उनके कदमों के नीचे लाल कालीन की तरह बिछ जाएं। अगर कोई देश सितारों को सामान्य समझना चाहता है तो इसमें क्या हर्ज है?
कुछ वर्ष पूर्व अमिताभ बच्चन को आयकर विभाग का रूटीन खत आया और अमर सिंह के कार्यकर्ताओं ने इलाहाबाद और कानपुर के आयकर दफ्तर में तोड़-फोड़ कर दी जबकि नोटिस मुंबई आयकर विभाग ने भेजा था, जहां शायद हुड़दंगी जुटाना अमर सिंह के लिए कष्टकारक हो सकता था। बहरहाल मुद्दा यह है कि हमने जिस वीआईपी संस्कृति को विकसित किया है, वह परोक्ष रूप से आम आदमी का अपमान है।
हर व्यक्ति की गरिमा अक्षुण्ण रहे, इसका हम कोई जतन नहीं करते। हम स्वतंत्र विचार को भी सहन नहीं कर सकते। भारत के तमाम हवाई अड्डों पर सामान्य व्यक्ति समय से पहले आता है, परंतु सितारों को केवल पांच मिनट पहले आने पर भी सम्मान सहित जगह दी जाती है और उनके लिए सुरक्षा नियम भी ढीले कर दिए जाते हैं। इन्हीं सहूलियतों का आदी वह सितारा जब अमेरिकी एयरपोर्ट पर दो घंटे गहन पूछताछ के लिए रोका जाता है, तो कुछ न्यूज चैनल यह उम्मीद करते हैं कि भारत सरकार विरोध दर्ज करे।
भूतपूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और शाहरुख खान में बहुत अंतर है।गौरतलब है कि शाहरुख खान करण जौहर की फिल्म ‘माय नेम इज खान’ की शूटिंग के लिए अमेरिका पहुंचे हैं। फिल्म का कथानक भी संभवत: अमेरिका में मुस्लिम लोगों को परेशान किए जाने से संबंधित है, परंतु करण का कहना है कि यह पाकिस्तानी फिल्म ‘खुदा के लिए’ या भारतीय ‘न्यूयॉर्क’ से बिलकुल अलग है।
आतंकवाद से सीधे संबंध न भी हो, तो भी फिल्म का टाइटिल कह रहा है कि यह मुस्लिम छवि से जुड़ी फिल्म है। जो कुछ एयरपोर्ट पर हुआ, वह फिल्म का प्रारंभिक दृश्य भी हो सकता है कि ‘माय नेम इज खान’ बोलते ही सुरक्षा अधिकारी सजग हो गए। हकीकत और अफसाने ऐसे ही एक-दूसरे में पैठ जाते हैं।
अगर हम सितारों की बात छोड़ भी दें, तो आम जीवन में हमने देखा है कि नियमों के परे सहूलियत लेने वाले अफसर और मंत्री पुत्र कहते हैं, ‘जानते हो, मैं कौन हूं!’ हमने ऐसे समाज की रचना की है कि नियम सब लोगों पर समान रूप से लागू नहीं होते। संविधान के दो आधारभूत सिद्धांत समानता और स्वतंत्रता कागज पर ही रह गए हैं। यह विशिष्ट लोगों का देश हो चुका है।शाहरुख के दो घंटे आम आदमी के दो घंटों से अलग हैं।
आप एक घंटे में कितना कमाते हैं, इस पर आपका आकलन होता है। जो निठल्ला कुछ नहीं कमाता, वह समय के हाशिए पर खड़ा है। अब समय और स्थान रुपए कमाने की क्षमता द्वारा परिभाषित होते हैं। विचारक लंबे समय तक कुछ करते नजर नहीं आते, अत: बाजार के मानदंड के अनुरूप वे सर्वथा बेकार और निठल्ले हैं। यही बाजार का हमेशा सपना रहा है, जो वर्तमान कालखंड में सच हो रहा है कि विचारक को खारिज करें।
Wednesday, August 19, 2009
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