मूंगफली पारंपरिक सिनेमा आस्वाद का प्रतीक है और पॉपकॉर्न सतही परिवर्तन का। आजादी की बासठवीं सालगिरह पर यह मलाल जरूर है कि देश में व्याप्त अन्याय और भ्रष्टाचार की पूरी सड़ांध सिनेमा कभी पूरी तरह से उजागर नहीं कर पाया।
व र्ष १947 में केवल 280 फिल्में प्रदर्शित हुई थीं और उनमें हिंदी में बनी फिल्मों की संख्या बहुत अधिक थी। विगत अनेक वर्षो से मुंबई में बनी हिंदी फिल्मों की संख्या प्रतिवर्ष औसतन 150 होती है और चार दक्षिण भारतीय भाषाओं में बनी फिल्मों का योग लगभग 600 होता है। गोयाकि संख्या के आधार पर अब भारतीय फिल्मों का मतलब दक्षिण भारतीय फिल्में हैं। मुंबई में बनी अनेक फिल्में दक्षिण की फिल्मों का उत्तर भारतीय संस्करण हैं। मुंबई के सभी सुपर सितारों से अधिक मेहनताना दक्षिण के सुपरस्टार रजनीकांत लेते हैं।
दक्षिण के सितारे अपने प्रशंसकों की तरह-तरह से सहायता करते हैं और मुंबइया सितारों की चैरिटी अपने घर से शुरू होकर अपने ही घर पर समाप्त होती है। सलमान खान जरूर अपवाद हैं। कुल जमा 10,000 सिनेमाघरों में अधिकतम दक्षिण भारत में हैं और न्यूनतम उन उत्तर भारतीय प्रांतों में, जहां जनसंख्या सबसे अधिक है। भारतीय फिल्म उद्योग का विगत 62 वर्षो का यह परिवर्तन कि इसका केंद्र मुंबई नहीं चेन्नई है, बहुत कम प्रचारित है।
दूसरा परिवर्तन मल्टीप्लैक्स लेकर आया। इसका सारांश यह है कि फिल्म देखते समय मूंगफली चबाने के बदले अब पॉपकॉर्न चबाया जाता है। पॉपकॉर्न महज चबाने की चीज नहीं होते हुए एक बड़े सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक बन गया है। मूंगफली पारंपरिक सिनेमा आस्वाद का प्रतीक है और पॉपकॉर्न सतही परिवर्तन का। मूंगफली कहानी को पकड़े हुए है, पॉपकॉर्न तकनीक को कथा के ऊपर रखता है। यह गौरतलब है कि सारे मल्टीप्लैक्स की अधिकतम आय पॉपकॉर्न, समोसे, शीतल पेय और पार्किग से है तथा न्यूनतम सिनेमा देखने के टिकट बिक्री से आती है। यह बात कुछ इस तरह है कि मतदान के एक छोटे सेप्रतिशत से बहुमत सरकार बन जाती है। मल्टीप्लैक्स ने भारतीय सिनेमा को अनेक स्तरों पर प्रभावित किया है। ‘ए वेडनेसडे’ और ‘भेजा फ्राय’ जैसी फिल्मों की सफलता की लहर मल्टीप्लैक्स से ही चलकर कस्बों और एकल ठाठिया तक पहुंची है।
मल्टीप्लैक्स के द्वारा ही दर्शक ने अच्छे बिंब और संपूर्ण ध्वनि के आनंद को समझा है और एकल ठाठिया ने भी इसी कारण सुधार का प्रयास किया है। मल्टी संकुल में जाकर दर्शक बिना वीजा और पासपोर्ट के पश्चिम के वैभव की झलक तीन घंटे के लिए देख पाता है। आजादी के 62 वर्षो में विदेश जा पाने के अवसर बमुश्किल दो प्रतिशत भारतीय लोगों को उपलब्ध हैं।
तीसरा बड़ा परिवर्तन निर्माण एवं वितरण क्षेत्र में कॉरपोरेट का उदय है। यह भारतीय सिनेमा में कॉरपोरेट संस्कृति की दूसरी पारी है। पहली पारी विगत सदी के तीसरे दशक में हिमांशु राय की बांबे टॉकीज और बीएन सरकार की न्यू थिएटर्स थी। अपनी पहली पारी में कॉरपोरेट का उद्देश्य सामाजिक प्रतिबद्धता वाली साहित्य आधारित फिल्में थीं, परंतु दूसरी पारी में केवल पैसा कमाना या सिनेमा के ग्लैमर से जुड़ना है। हालांकि ‘रंग दे बंसती,’ ‘तारे जमीं पर’ और ‘मुन्नाभाई’ भी कॉरपोरेट कृतियां हैं। यह भी सच है कि लगभग सभी कॉरपोरेट के मालिक बेहतर सिनेमा चाहते हैं, परंतु विशाल संयंत्र को चलाने के लिए नियुक्त टाईधारी आईएएस अफसरों की तरह हेकड़ीबाज लोग हैं।
मनोरंजन उद्योग में चौथा परिवर्तन टेलीविजन ने प्रस्तुत किया है। सैटेलाइट सिनेमा अधिकार महंगे दामों में बिकने के कारण फिल्मोद्योग को अतिरिक्त आय प्राप्त हुई है। पांचवां परिवर्तन है सिनेमा तकनीक का विकास। विगत के बेहतर कथ्य की बात करने वाले स्वर्णकाल में बनी कई घटिया फिल्मों को नजरअंदाज कर जाते हैं। दरअसल घटिया फिल्मों में भी सामाजिक प्रतिबद्धता का छोटा सा अंश होता है और बेहतर सिनेमा में मनोरंजक बातें होती हैं। यही भारतीय सिनेमा का सच्च स्वरूप है।
आजादी की बासठवीं सालगिरह पर यह मलाल जरूर है कि देश में व्याप्त अन्याय और भ्रष्टाचार की पूरी सड़ांध सिनेमा कभी पूरी तरह से उजागर नहीं कर पाया। यह अवाम की सोच में परिवर्तन का सबब भी नहीं बन पाया, क्योंकि न तो हमने आजादी की सच्ची परिभाषा प्रस्तुत की और न ही राष्ट्रीय सिनेमा को परिभाषित किया।
Sunday, August 16, 2009
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